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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 245
 
 
श्लोक  2.8.245 
प्रभु कहे, - “कोन्विद्या विद्या - मध्ये सार ?” ।
राय कहे , - ”कृष्ण - भक्ति विना विद्या नाहि आ र” ॥245॥
 
 
अनुवाद
एक अवसर पर प्रभु ने पूछा, “सभी प्रकार की शिक्षाओं में से सबसे महत्वपूर्ण कौन सी है?”
 
On one occasion, Mahaprabhu asked, “Of all the knowledge, which knowledge is the most important?” Ramanand Rai replied, “No knowledge is important except divine devotion to Krishna.”
तात्पर्य
रामानंद राय ने उत्तर दिया, "कृष्ण की प्रेममय भक्ति-भावना के अलावा कोई शिक्षा महत्वपूर्ण नहीं है।"

पाठ 245 से 257 तक श्री चैतन्य महाप्रभु और रामानंद राय के बीच के प्रश्नोत्तर हैं। इन वार्तालापों में भौतिक और आध्यात्मिक अस्तित्व के बीच का अंतर दिखाने का प्रयास किया गया है। कृष्ण-चेतना में शिक्षा हमेशा पारलौकिक होती है और सभी प्रकार की शिक्षाओं में श्रेष्ठ है। भौतिक शिक्षा का उद्देश्य भौतिक इंद्रिय-तृप्ति की गतिविधियों को बढ़ाना है। भौतिक इंद्रिय-तृप्ति से परे ज्ञान का एक और नकारात्मक रूप है जिसे ब्रह्म-विद्या या अवैयक्तिक पारलौकिक ज्ञान कहा जाता है। पर उस ब्रह्म-विद्या या अवैयक्तिक ब्रह्म के ज्ञान से भी परे परम भगवान, विष्णु की भक्ति-भावना का ज्ञान है। यह ज्ञान श्रेष्ठ है। और उससे भी श्रेष्ठ भगवान कृष्ण की भक्ति-भावना है, जो शिक्षा का सर्वोच्च रूप है। श्रीमद्-भागवतम (4.29.49) के अनुसार, "तत् कर्म हरि-तोषं यत् सा विद्या तन्-मतिर् यया:" "जो कार्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है, वह सर्वोत्तम है, और वह शिक्षा जो किसी की कृष्ण-चेतना को बढ़ाती है, सर्वोत्तम है।"

साथ ही, श्रीमद्-भागवतम (7.5.23-24) के अनुसार:

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम्

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यं आत्म-निवेदनम्

इति पुंसारपिता विष्णौ भक्तिस चेन नव-लक्षणा

क्रियेत भगवत्यं अद्धा तन् मन्ये 'धीतम् उत्तमम्

यह प्रह्लाद महाराज द्वारा अपने पिता द्वारा उठाए गए प्रश्न के उत्तर में दिया गया एक कथन है। प्रह्लाद महाराज ने कहा, "भगवान विष्णु के बारे में सुनना या जप करना, उन्हें याद रखना, उनके चरणकमलों की सेवा करना, उनकी पूजा करना, उन्हें प्रार्थना करना, उनका सेवक और उनका मित्र बनना, उनकी सेवा में सब कुछ त्याग देना - ये सभी भक्ति-भावना के प्रकार हैं। जो व्यक्ति ऐसी गतिविधियों में लगा रहता है, उसे सर्वोच्च पूर्णता तक शिक्षित माना जाता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)