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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 229
 
 
श्लोक  2.8.229 
सिद्ध - देहे चिन्ति’ करे ताहाँञि सेवन ।
सखी - भावे पाय राधा - कृष्णेर चरण ॥229॥
 
 
अनुवाद
"लंबे समय तक राधा और कृष्ण तथा उनकी लीलाओं का चिंतन करने और भौतिक कल्मष से पूर्णतः मुक्त होने के बाद, व्यक्ति आध्यात्मिक जगत में स्थानांतरित हो जाता है। वहाँ भक्त को गोपियों के रूप में राधा और कृष्ण की सेवा करने का अवसर प्राप्त होता है।"
 
"After contemplating Radha and Krishna and their pastimes for a long time and becoming completely free from material contamination, one ascends to the spiritual world. There, the devotee receives the opportunity to serve Radha and Krishna as a gopi."
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर टिप्पणी करते हैं कि शब्द सिद्ध-देह, "पूर्ण आध्यात्मिक शरीर," पाँच तत्वों से बने स्थूल भौतिक शरीर और मन, बुद्धि और अहंकार से बने सूक्ष्म नक्षत्र शरीर से परे एक शरीर को संदर्भित करता है। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति एक पूर्ण आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करता है जो पारलौकिक युगल राधा और कृष्ण की सेवा करने के लिए उपयुक्त है: सर्वोपधि-विनिर्मुक्तम् तत-परात्वेन निर्मलम्।

जब व्यक्ति अपने आध्यात्मिक शरीर में स्थित होता है, जो इस स्थूल और सूक्ष्म भौतिक शरीर से परे है, तो वह राधा और कृष्ण की सेवा करने के लिए उपयुक्त होता है। उस शरीर को सिद्ध-देह कहा जाता है। जीव अपनी पिछली गतिविधियों और मानसिक स्थिति के अनुसार एक विशेष प्रकार का स्थूल शरीर प्राप्त करता है। इस जीवन में मानसिक स्थिति अलग-अलग तरीकों से बदलती है, और वही जीव अपनी इच्छाओं के अनुसार अगले जीवन में एक और शरीर प्राप्त करता है। मन, बुद्धि और अहंकार हमेशा भौतिक प्रकृति पर हावी होने के प्रयास में लगे रहते हैं। उस सूक्ष्म नक्षत्र शरीर के अनुसार, व्यक्ति अपनी इच्छाओं की वस्तुओं का आनंद लेने के लिए एक स्थूल शरीर प्राप्त करता है। वर्तमान शरीर की गतिविधियों के अनुसार, व्यक्ति एक और सूक्ष्म शरीर तैयार करता है। और सूक्ष्म शरीर के अनुसार, व्यक्ति एक और स्थूल शरीर प्राप्त करता है। यह भौतिक अस्तित्व की प्रक्रिया है। हालाँकि, जब कोई आध्यात्मिक रूप से स्थित होता है और स्थूल या सूक्ष्म शरीर की इच्छा नहीं करता है, तो वह अपने मूल आध्यात्मिक शरीर को प्राप्त करता है। जैसा कि भगवद-गीता (4.9) द्वारा पुष्टि की गई है: त्याक्त्वा देहम पुनर् जन्म नैति माम एति सो अर्जुन।

व्यक्ति आध्यात्मिक शरीर द्वारा आध्यात्मिक दुनिया में ऊपर उठाया जाता है और गोलोक वृंदावन या किसी अन्य वैकुण्ठ ग्रह में स्थित होता है। आध्यात्मिक शरीर में अब भौतिक इच्छाएँ नहीं होती हैं, और व्यक्ति ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व राधा और कृष्ण की सेवा करके पूरी तरह से संतुष्ट होता है। यह भक्ति का मंच है (हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरूच्यते)। जब आध्यात्मिक शरीर, मन और इंद्रियां पूरी तरह से शुद्ध हो जाती हैं, तो व्यक्ति ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व और उनकी पत्नी की सेवा कर सकता है। वैकुण्ठ में पत्नी लक्ष्मी है, और गोलोक वृंदावन में पत्नी श्रीमती राधारानी है। आध्यात्मिक शरीर में, भौतिक संदूषण से मुक्त होकर, व्यक्ति राधा-कृष्ण और लक्ष्मी-नारायण की सेवा कर सकता है। जब व्यक्ति इस प्रकार आध्यात्मिक रूप से स्थित होता है, तो वह अब अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के बारे में नहीं सोचता है। इस आध्यात्मिक शरीर को सिद्ध-देह कहा जाता है, वह शरीर जिसके द्वारा व्यक्ति राधा और कृष्ण को पारलौकिक सेवा प्रदान कर सकता है। प्रक्रिया प्रेममय भक्ति सेवा में पारलौकिक इंद्रियों को शामिल करने की है। यह पद विशेष रूप से उल्लेख करता है, सखी-भावे पाया राधा-कृष्णरा चरण: केवल गोपी के मनोभाव में पारलौकिक रूप से उन्नत व्यक्ति ही राधा और कृष्ण के चरण-कमलों की सेवा में संलग्न हो सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)