श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  2.8.217 
निजेन्द्रिय - सुख - हेतु कामेर तात्पर्य ।
कृष्ण - सुख - तात्पर्य गोपी - भाव - वर्य ॥217॥
 
 
अनुवाद
"कामुक इच्छाएँ तब अनुभव होती हैं जब व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत इंद्रिय-तृप्ति में लगा रहता है। गोपियों की मनोदशा ऐसी नहीं है। उनकी एकमात्र इच्छा कृष्ण की इंद्रियों को तृप्त करना है।"
 
"Lustful desires are experienced when one is eager for sense gratification. But the gopis do not feel that way. Their only desire is to satisfy Krishna's senses."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)