श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 211
 
 
श्लोक  2.8.211 
सख्यः श्री - राधिकाया व्रज - कुमुद - विधोर्ह्लादिनी - नाम - शक्तेः सारांश - प्रेम - वल्ल्याः किसलय - दल - पुष्पादि - तुल्याः स्व - तुल्याः ।
सिक्तायां कृष्ण - लीलामृत - रस - निचयैरुल्लसन्त्याममुष्यां जातोल्लासाः स्व - सेकाच्छत - गुणमधिकं सन्ति यत्तन्न चित्रम् ॥211॥
 
 
अनुवाद
“श्रीमती राधारानी की सखियाँ, सभी गोपियाँ, उनके समान हैं। कृष्ण व्रजभूमिवासियों को उसी प्रकार प्रिय हैं, जैसे कमल पुष्प को चन्द्रमा प्रिय है। उनकी सुखदायी शक्ति आह्लादिनी कहलाती है, जिसका क्रियाशील तत्त्व श्रीमती राधारानी हैं। उनकी तुलना नए-नए पुष्पों और पत्तियों वाली लता से की गई है। जब श्रीमति राधारानी पर कृष्ण की लीलाओं का रस छिड़का जाता है, तो उनकी सभी सखियाँ, गोपियाँ, उस रस का सौ गुना अधिक आनंद लेती हैं, जितना कि स्वयं उन पर छिड़का जाता। वास्तव में यह कोई अद्भुत बात नहीं है।”
 
"Srimati Radharani's personal friends—all the gopis—are like her. Just as the moon is pleasing to the lotus flowers, Krishna is pleasing to the inhabitants of Vrajabhumi. His blissful energy is called Ahaladini, the main active element of which is Srimati Radharani. She is compared to a creeper bearing new flowers and buds. When the nectar of Krishna's pastimes is sprinkled on Srimati Radharani, all her friends (gopis) experience a hundred times more joy than when the nectar is sprinkled on themselves. This is not surprising at all."
तात्पर्य
यह छंद भी गोविन्द-लीलामृत (10.16) से लिया गया है |
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)