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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 193
 
 
श्लोक  2.8.193 
एत ब लि’ आपन - कृत गीत एक गाहिल ।
प्रेमे प्रभु स्व - हस्ते ताँर मुख आच्छादिल ॥193॥
 
 
अनुवाद
यह कहकर रामानन्द राय ने अपना रचा हुआ गीत गाना आरम्भ किया, किन्तु भगवान के प्रेम के उन्माद में श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरन्त ही अपने हाथ से रामानन्द का मुख ढक दिया।
 
Saying this, Ramanand Rai started singing a song of his own composition, but Sri Chaitanya Mahaprabhu, overcome with emotion, immediately closed Ramanand Rai's mouth with his hand.
तात्पर्य
जिन विषयों पर भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु और रामानन्द राय के बीच चर्चा होने जा रही है, उन्हें कोई भौतिकवादी कवि या किसी बुद्धि या भौतिक अनुभूति से नहीं समझा जा सकता है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि आध्यात्मिक रस का अनुभव केवल तभी हो सकता है जब कोई भौतिक अच्छाई के चरण से परे आध्यात्मिक स्तर पर स्थित हो। उस स्तर को विशुद्ध-सत्त्व (सत्त्वं विशुद्धं वासुदेव-शब्दितम्) कहा जाता है। विशुद्ध-सत्त्व स्तर का एहसास भौतिक दुनिया के दायरे से बाहर है और शारीरिक इंद्रियों या मानसिक अटकलों से नहीं माना जाता है। स्थूल शरीर और सूक्ष्म मन के साथ हमारी पहचान आध्यात्मिक समझ से अलग है। चूंकि बुद्धि और मन भौतिक हैं, इसलिए श्री राधा और कृष्ण के प्रेम संबंध उनकी धारणा से परे हैं। सर्वोपधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्: जब हम सभी भौतिक पदनामों से मुक्त होते हैं और हमारी इंद्रियां भक्ति प्रक्रिया से पूरी तरह से शुद्ध हो जाती हैं, तो हम परम सत्य (हृषिकेण हृषिकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते) के इंद्रिय कार्यकलाप को समझ सकते हैं।

आध्यात्मिक इंद्रियाँ भौतिक इंद्रियों से परे हैं। एक भौतिकवादी केवल भौतिक विविधता के निषेध के बारे में सोच सकता है; वह आध्यात्मिक विविधता को नहीं समझ सकता है। वह सोचता है कि आध्यात्मिक विविधता बस भौतिक विविधता का खंडन करती है और एक निषेध या शून्यता है, लेकिन ऐसी अवधारणाएँ आध्यात्मिक बोध के परिसर तक भी नहीं पहुँच सकती हैं। स्थूल शरीर और सूक्ष्म मन की अद्भुत गतिविधियाँ हमेशा अपूर्ण होती हैं। वे आध्यात्मिक समझ की डिग्री से नीचे हैं और क्षणभंगुर हैं। आध्यात्मिक रस हमेशा अद्भुत होता है और इसे पूर्ण, शुद्ध, नित्य-मुक्त के रूप में वर्णित किया गया है - अर्थात, पूर्ण, पूर्ण रूप से शुद्ध और सभी भौतिक अवधारणाओं से हमेशा के लिए मुक्त। जब हम अपनी भौतिक इच्छाओं को पूरा करने में असमर्थ होते हैं, तो निश्चित रूप से दुःख और भ्रम होता है। इसे विवर्त कहा जा सकता है। लेकिन आध्यात्मिक जीवन में कोई दुख, मादकता या अपूर्णता नहीं होती है। श्रील रामानन्द राय श्रीमती राधारानी और कृष्ण की आध्यात्मिक गतिविधियों को साकार करने में निपुण थे, और रामानन्द के आध्यात्मिक अनुभव को श्री चैतन्य महाप्रभु के सामने रखा गया क्योंकि उन्होंने पूछा कि क्या भगवान ने आध्यात्मिक सत्य की उनकी प्राप्ति को मंजूरी दी है।

इस सम्बन्ध में तीन प्रमुख पुस्तकें हैं। एक भक्त दास बाऊल द्वारा लिखी गई है जिसका नाम विवर्त विलास है। दूसरी पुस्तक जगदानंद पंडित द्वारा संकलित है जिसका नाम प्रेम विवर्त है। श्री रामानंद राय की पुस्तक का नाम प्रेम विलास विवर्त है। भक्त दास बाऊल द्वारा रचित विवर्त विलास अन्य दो पुस्तकों से भिन्न है। कभी-कभी विश्वविद्यालय के छात्र या प्रोफेसर इस पारलौकिक साहित्य का अध्ययन करने का प्रयास करते हैं और सांसारिक दृष्टिकोण से एक आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं, जिसका उद्देश्य पीएचडी जैसी उपाधियाँ प्राप्त करना होता है। ऐसी उपलब्धि निश्चित रूप से रामानंद राय की उपलब्धि से अलग है। यदि कोई वास्तव में श्री चैतन्य महाप्रभु से पीएचडी की उपाधि लेना चाहता है और रामानंद राय द्वारा स्वीकृत होना चाहता है, तो उसे पहले सभी भौतिक पदनामों से मुक्त होना चाहिए (सर्वोपाधि-विर्मुक्तं तत्तर्पतवेन निर्मल)। जो व्यक्ति अपने भौतिक शरीर से तादात्म्य स्थापित करता है, वह श्री रामानंद राय और श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच इन बातचीत को समझ नहीं पाता है। मानव निर्मित धार्मिक ग्रंथ और पारलौकिक दार्शनिक वार्ताएँ काफी भिन्न हैं। वास्तव में, दोनों के बीच एक बड़ा अंतर है। इस विषय का वर्णन श्रीमान् माध्वाचार्य ने बड़े परिश्रम से किया है। चूँकि भौतिक दार्शनिक जीवन की भौतिक अवधारणा में स्थित होते हैं, वे आध्यात्मिक प्रेम विलास विवर्त को समझने में असमर्थ होते हैं। वे हाथी को थाली पर नहीं रख सकते। इसी तरह, सांसारिक विचारक अपने सीमित ज्ञान के भीतर आध्यात्मिक हाथी को समझ नहीं सकते हैं। यह ठीक उसी तरह है जैसे एक मेंढक अपने कुएँ से कई गुना बड़ा होने की कल्पना करके अटलांटिक महासागर को मापने का प्रयास करता है। भौतिकवादी दार्शनिक और सहजिया श्री राधा और कृष्ण के विलास के विषय में रामानंद राय और श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच की बातचीत को नहीं समझ सकते हैं। अद्वैतवादियों या प्राकृत सहजिया की एकमात्र प्रवृत्ति अद्वैतवाद के मंच का सामना करना है। वे आध्यात्मिक विविधता को समझ नहीं पाते हैं। परिणामस्वरूप, जब रामानंद राय ने अपने स्वयं के छंद गाने का प्रयास किया, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने हाथ से अपना मुँह ढँक कर उन्हें रोक दिया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)