आध्यात्मिक इंद्रियाँ भौतिक इंद्रियों से परे हैं। एक भौतिकवादी केवल भौतिक विविधता के निषेध के बारे में सोच सकता है; वह आध्यात्मिक विविधता को नहीं समझ सकता है। वह सोचता है कि आध्यात्मिक विविधता बस भौतिक विविधता का खंडन करती है और एक निषेध या शून्यता है, लेकिन ऐसी अवधारणाएँ आध्यात्मिक बोध के परिसर तक भी नहीं पहुँच सकती हैं। स्थूल शरीर और सूक्ष्म मन की अद्भुत गतिविधियाँ हमेशा अपूर्ण होती हैं। वे आध्यात्मिक समझ की डिग्री से नीचे हैं और क्षणभंगुर हैं। आध्यात्मिक रस हमेशा अद्भुत होता है और इसे पूर्ण, शुद्ध, नित्य-मुक्त के रूप में वर्णित किया गया है - अर्थात, पूर्ण, पूर्ण रूप से शुद्ध और सभी भौतिक अवधारणाओं से हमेशा के लिए मुक्त। जब हम अपनी भौतिक इच्छाओं को पूरा करने में असमर्थ होते हैं, तो निश्चित रूप से दुःख और भ्रम होता है। इसे विवर्त कहा जा सकता है। लेकिन आध्यात्मिक जीवन में कोई दुख, मादकता या अपूर्णता नहीं होती है। श्रील रामानन्द राय श्रीमती राधारानी और कृष्ण की आध्यात्मिक गतिविधियों को साकार करने में निपुण थे, और रामानन्द के आध्यात्मिक अनुभव को श्री चैतन्य महाप्रभु के सामने रखा गया क्योंकि उन्होंने पूछा कि क्या भगवान ने आध्यात्मिक सत्य की उनकी प्राप्ति को मंजूरी दी है।
इस सम्बन्ध में तीन प्रमुख पुस्तकें हैं। एक भक्त दास बाऊल द्वारा लिखी गई है जिसका नाम विवर्त विलास है। दूसरी पुस्तक जगदानंद पंडित द्वारा संकलित है जिसका नाम प्रेम विवर्त है। श्री रामानंद राय की पुस्तक का नाम प्रेम विलास विवर्त है। भक्त दास बाऊल द्वारा रचित विवर्त विलास अन्य दो पुस्तकों से भिन्न है। कभी-कभी विश्वविद्यालय के छात्र या प्रोफेसर इस पारलौकिक साहित्य का अध्ययन करने का प्रयास करते हैं और सांसारिक दृष्टिकोण से एक आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं, जिसका उद्देश्य पीएचडी जैसी उपाधियाँ प्राप्त करना होता है। ऐसी उपलब्धि निश्चित रूप से रामानंद राय की उपलब्धि से अलग है। यदि कोई वास्तव में श्री चैतन्य महाप्रभु से पीएचडी की उपाधि लेना चाहता है और रामानंद राय द्वारा स्वीकृत होना चाहता है, तो उसे पहले सभी भौतिक पदनामों से मुक्त होना चाहिए (सर्वोपाधि-विर्मुक्तं तत्तर्पतवेन निर्मल)। जो व्यक्ति अपने भौतिक शरीर से तादात्म्य स्थापित करता है, वह श्री रामानंद राय और श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच इन बातचीत को समझ नहीं पाता है। मानव निर्मित धार्मिक ग्रंथ और पारलौकिक दार्शनिक वार्ताएँ काफी भिन्न हैं। वास्तव में, दोनों के बीच एक बड़ा अंतर है। इस विषय का वर्णन श्रीमान् माध्वाचार्य ने बड़े परिश्रम से किया है। चूँकि भौतिक दार्शनिक जीवन की भौतिक अवधारणा में स्थित होते हैं, वे आध्यात्मिक प्रेम विलास विवर्त को समझने में असमर्थ होते हैं। वे हाथी को थाली पर नहीं रख सकते। इसी तरह, सांसारिक विचारक अपने सीमित ज्ञान के भीतर आध्यात्मिक हाथी को समझ नहीं सकते हैं। यह ठीक उसी तरह है जैसे एक मेंढक अपने कुएँ से कई गुना बड़ा होने की कल्पना करके अटलांटिक महासागर को मापने का प्रयास करता है। भौतिकवादी दार्शनिक और सहजिया श्री राधा और कृष्ण के विलास के विषय में रामानंद राय और श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच की बातचीत को नहीं समझ सकते हैं। अद्वैतवादियों या प्राकृत सहजिया की एकमात्र प्रवृत्ति अद्वैतवाद के मंच का सामना करना है। वे आध्यात्मिक विविधता को समझ नहीं पाते हैं। परिणामस्वरूप, जब रामानंद राय ने अपने स्वयं के छंद गाने का प्रयास किया, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने हाथ से अपना मुँह ढँक कर उन्हें रोक दिया।
