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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 190
 
 
श्लोक  2.8.190 
वाचा सूचित - शर्वरी - रति - कला - प्रागल्भ्यया राधि कां व्रीड़ा - कुञ्चित - लोचनां विरचयन्नग्रे सखीनामसौ ।
तद्वक्षोरुह - चित्र - केलि - मकरी - पाण्डित्य - पारं गतः कैशोरं सफली - करोति कल यन्कुञ्जे विहारं हरिः ॥190॥
 
 
अनुवाद
“इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने पिछली रात्रि की यौन गतिविधियों का वर्णन किया। इस प्रकार उन्होंने श्रीमती राधारानी को लज्जा से आँखें बंद करने को कहा। इस अवसर का लाभ उठाकर, श्रीकृष्ण ने उनके वक्षस्थल पर विभिन्न प्रकार की डॉल्फ़िनों का चित्रांकन किया। इस प्रकार वे सभी गोपियों के लिए एक अत्यंत कुशल कलाकार बन गए। ऐसी लीलाओं के दौरान, भगवान ने अपनी युवावस्था की पूर्णता का आनंद लिया।”
 
"In this way, Lord Krishna described the previous night's lovemaking. Radharani closed her eyes in embarrassment. Seizing this opportunity, Krishna painted various fishes on her breasts. Thus, he became a highly skilled painter for all the gopis. In such pastimes, the Lord fully enjoyed his adolescence."
तात्पर्य
यह उद्धरण भक्ति-रसामृत-सिंधु (2.1.119) में भी मिलता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)