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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 175
 
 
श्लोक  2.8.175 
‘किल - किञ्चितादि’ - भाव - विंशति - भूषित ।
गुण - श्रेणी - पुष्पमाला सर्वाङ्गे पूरित ॥175॥
 
 
अनुवाद
"उनके शरीर को किल-किंचित से आरंभ होने वाले बीस प्रकार के आनंदमय लक्षण भी अलंकृत करते हैं। उनके दिव्य गुण उनके शरीर पर पूर्ण रूप से लटकी हुई पुष्पमाला का निर्माण करते हैं।"
 
"His body is adorned with twenty types of emotions, beginning with kilkinchit. His divine qualities form a garland of flowers hanging all over his body."
तात्पर्य
किला-किञ्चित से शुरू होने वाले बीस अलग-अलग मनोभावों का वर्णन इस प्रकार किया गया है। सबसे पहले, शरीर के संबंध में, भाव (उत्साह), हाव (इशारे) और हेला (उपेक्षा) होते हैं; स्वयं के संबंध में शोभा (सुंदरता), कांति (चमक), दीप्ति (प्रभामंडल), माधुर्य (मिठास), प्रगल्भता (निडरता), औदार्य (उदारता) और धैर्य (सहनशीलता) होते हैं; और प्रकृति के संबंध में लीला (शगल), विलास (आनंद), विच्छित्ति (विघ्न) और विभ्रम (भ्रम) होते हैं। किला-किञ्चित, मोट्टायित और कुट्टामित शब्दों के लिए कोई अंग्रेजी समकक्ष नहीं हैं।

श्रीमती राधारानी की फूलों की माला में उनके गुण होते हैं और मानसिक, मौखिक और शारीरिक भागों में विभाजित होती है। क्षमा और दया का उनका दृष्टिकोण पूरी तरह से मानसिक है। उनकी बातें, जो कान को बहुत भली लगती हैं, मौखिक हैं। शारीरिक गुण आयु, सुंदरता, चमक और अनुग्रह हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)