श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 173
 
 
श्लोक  2.8.173 
राग - ताम्बूल - रागे अधर उज्वल ।
प्रेम - कौटिल्य - नेत्र - युगले कजल ॥173॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण के प्रति उनकी आसक्ति उनके उज्ज्वल होठों पर लगे सुपारी के लाल रंग के समान है। प्रेम-संबंधों में उनके दोहरे व्यवहार उनकी आँखों के चारों ओर लगे काले लेप के समान हैं।"
 
"Her devotion to Krishna is the red color of the betel leaf on her shiny lips. Her love-cunningness is the kajal in her eyes."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)