Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 142
 
 
श्लोक  2.8.142 
अखिल - रसामृत - मूर्तिः प्रसृमर - रुचि - रुद्ध - तारका - पालिः ।
कलित - श्यामा - ललितो राधा - प्रेयान्विधुर्जयति ॥142॥
 
 
अनुवाद
"भगवान कृष्ण की जय हो! अपने विस्तृत होते आकर्षक स्वरूप से उन्होंने तारका और पाली नामक गोपियों को वश में कर लिया तथा श्यामा और ललिता के मन को अपने वश में कर लिया। वे श्रीमती राधारानी के परम आकर्षक प्रेमी हैं और समस्त दिव्य रसों में भक्तों के आनंद के आगार हैं।"
 
"Victory to the Supreme Personality of Godhead, Krishna! By His ever-increasing attractive features, He has conquered the gopis Taraka and Pali, and has captivated the hearts of Shyama and Lalita. He is the most attractive lover of Srimati Radharani and the reservoir of bliss for devotees in all the rasas."
तात्पर्य
हर किसी के पास एक खास पारमार्थिक भाव होता है जिससे वो कृष्ण से प्रेम करता है और उनकी सेवा करता है। कृष्ण हर तरह के भक्त के लिए सबसे आकर्षक व्यक्तित्व हैं। इसलिए उन्हें अखिल-रसामृत-मूर्ति कहा गया है, जो सभी प्रकार के भक्तों के लिए आकर्षण का परम रूप हैं, चाहे भक्त शांत-रस, दास्य-रस, सखा-रस, वात्सल्य-रस या माधुर्य-रस में क्यों न हो।

यह श्रील रूप गोस्वामी द्वारा लिखी गई भक्ति-रसामृत-सिंधु का उद्घाटक श्लोक है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)