यद्यपि राय - प्रेमी, महा - भागवते ।
ताँर मन कृष्ण - माया नारे आच्छादिते ॥130॥
तथापि प्रभुर इच्छा - परम प्रबल ।
जानिलेह रायेर मन हैल टलमल ॥131॥
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अनुवाद
श्री रामानन्द राय भगवान के महान भक्त तथा भगवद् प्रेमी थे, और यद्यपि उनका मन कृष्ण की माया से आच्छादित नहीं हो सका, तथा यद्यपि वे भगवान के मन को समझ सकते थे, जो कि अत्यन्त प्रबल तथा तीव्र था, फिर भी रामानन्द का मन थोड़ा विचलित हो गया।
Sri Ramanand Rai was a great devotee of the Lord and a lover of God and although his mind could never be clouded by the illusion of Krishna and he could understand the firm and serious mind of the Lord, yet Ramanand's mind became somewhat disturbed.
तात्पर्य
भगवान् की परम वासनाओं के अनुसार कार्य करने वाला भक्त पूर्ण कहलाता है। किन्तु भौतिकवादी पुरुष भौतिक ऊर्जा की लहरों के साथ बह जाता है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने कहा है कि "मायार बसे, याच्छे भेषे खाच्छे हावुडुबु भाई।" भौतिक ऊर्जा के चंगुल में फंसा हुआ व्यक्ति उस मायावी ऊर्जा की लहरों के साथ बह जाता है। दूसरे शब्दों में, भौतिक संसार में रहने वाला पुरुष माया का सेवक होता है। किन्तु, आध्यात्मिक ऊर्जा में रहने वाला पुरुष भगवान् का सेवक होता है। यद्यपि रामानंद राय को पता था कि श्री चैतन्य महाप्रभु को कुछ भी अज्ञात नहीं है, लेकिन फिर भी उन्होंने उस विषय पर आगे बात करना शुरू कर दिया क्योंकि भगवान् ने ही इसकी इच्छा की थी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥