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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  2.8.100 
अनयाराधितो नूनं भगवान्हरिरीश्वरः ।
यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद्रहः ॥100॥
 
 
अनुवाद
“[जब गोपियाँ आपस में बात करने लगीं, तो उन्होंने कहा:] ‘प्रिय मित्रों, जिस गोपी को कृष्ण एकांत स्थान पर ले गए हैं, उसने अवश्य ही अन्य किसी की अपेक्षा भगवान की अधिक पूजा की होगी।’”
 
“[The gopis, talking to each other, said:] ‘O friends, the gopi whom Krishna has taken with Him to a secluded place must have worshipped the Lord more than all the others.”
तात्पर्य
राधा नाम इस पद (भाग. 10.30.28) से आया है, अनायाराद्धितः शब्द से, जिसका अर्थ है "उसने ही प्रभु की पूजा की।" कभी-कभी श्रीमद् भागवतम के आलोचकों को उस पुस्तक में राधारानी का पवित्र नाम ढूंढना मुश्किल हो जाता है, लेकिन रहस्य यहाँ अराधित शब्द में बताया गया है, जहाँ से राधा नाम आया है। बेशक, राधारानी के नाम का सीधा उल्लेख अन्य पुराणों में है। कृष्ण की इस गोपी की उपासना सबसे ऊपर है, और इसलिए उसका नाम राधा या "सबसे ऊपर उपासक" है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)