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श्लोक 2.7.95  |
मत्त - सिंह - प्राय प्रभु करिला गमन ।
प्रेमावेशे याय करि’ नाम - सङ्कीर्तन ॥95॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु लगभग उन्मत्त सिंह के समान प्रेम से परिपूर्ण होकर तथा संकीर्तन करते हुए, कृष्ण के नामों का इस प्रकार जप करते हुए भ्रमण पर निकले। |
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| Almost like a mad lion, Sri Chaitanya Mahaprabhu set out on his journey. He was filled with love and continued chanting the name of Krishna as follows. |
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