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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  2.7.71 
ताँरे उपेक्षिया कैल शीघ्र गमन ।
के बुझिते पारे महाप्रभुर चित्त - मन ॥71॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि सार्वभौम भट्टाचार्य मूर्छित हो गए, फिर भी श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन पर ध्यान नहीं दिया। बल्कि, वे शीघ्र ही चले गए। श्री चैतन्य महाप्रभु के मन और इरादे को कौन समझ सकता है?
 
Although Sarvabhauma Bhattacharya fainted, Sri Chaitanya Mahaprabhu paid no attention to this and immediately left. Who can understand the mind and emotions of Sri Chaitanya Mahaprabhu?
तात्पर्य
यह स्वाभाविक रूप से अपेक्षित था कि जब सर्वभौम भट्टाचार्य मूर्छित होकर जमीन पर गिरेंगे तब श्री चैतन्य महाप्रभु उनकी देखरेख करेंगे और उनके होश में आने का इंतजार करेंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय, श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरंत अपनी यात्रा शुरू कर दी। इसलिए एक दिव्य व्यक्ति की क्रियाओं को समझना बहुत मुश्किल है। कभी-कभी वे थोड़ी अजीब लग सकती हैं, लेकिन एक दिव्य व्यक्तित्व भौतिक विचारों से अप्रभावित, अपनी स्थिति में बना रहता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)