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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  2.7.69 
“घरे कृष्ण भजि’ मोरे करिह आशीर्वादे ।
नीलाचले आ सि’ येन तोमार प्रसादे” ॥69॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने भट्टाचार्य से प्रार्थना की कि जब वे घर पर भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन हों तो उन्हें आशीर्वाद दें, ताकि सार्वभौम की कृपा से भगवान जगन्नाथ पुरी लौट सकें।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu told Bhattacharya to continue blessing him while he was engaged in the devotion of Lord Krishna at home, so that by the grace of the Sovereign he could return to Jagannatha Puri again.
तात्पर्य
करिहा आशिर्वाद शब्द का अर्थ है "मुझे अपने आशीर्वाद देते रहो।" एक संन्यासी होने के नाते, चैतन्य महाप्रभु जीवन के चौथे आश्रम में थे और इस प्रकार वे सभी सम्मान और पूजा के पात्र थे, जबकि गृहस्थ के रूप में सर्वभौम भट्टाचार्य दूसरे आश्रम में थे। एक संन्यासी को एक गृहस्थ को आशीर्वाद देने चाहिए, फिर भी अब, अपने व्यवहार से, श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक गृहस्थ का आशीर्वाद मांगा। यह घटना श्री चैतन्य महाप्रभु के उपदेश के विशेष महत्व को दर्शाती है। उन्होंने भौतिक विचारों की परवाह किए बिना, सभी को समान दर्जा दिया। उनका आंदोलन पूरी तरह से आध्यात्मिक है। गृहस्थ होने के बावजूद, सर्वभौम भट्टाचार्य कामुकता में रुचि रखने वाले कर्मियों से भिन्न थे। श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा दीक्षा लेने के बाद, भट्टाचार्य आध्यात्मिक व्यवस्था में पूरी तरह से स्थित थे; इसलिए उनके लिए एक संन्यासी को भी आशीर्वाद देना संभव था। वह हमेशा घर पर भी भगवान की सेवा में लगे रहते थे। हमारी शिष्य परंपरा में हमारे पास एक पूर्ण गृहस्थ परमहंस का उदाहरण है - श्रील भक्तिविनोद ठाकुर। अपनी पुस्तक शरणागति में, भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं, ये-दिना गृहे, भजन देखि', गृहेते गोलोक भाय (शरणागति 31.6)। जब भी एक गृहस्थ अपने घर में परम भगवान का गुणगान करता है, तो उसकी क्रियाएं तुरंत गोलोक वृंदावन की क्रियाओं में बदल जाती हैं, आध्यात्मिक क्रियाएं कृष्ण के गोलोक वृंदावन ग्रह में होती हैं। कृष्ण द्वारा स्वयं भौमा वृंदावन में प्रदर्शित की गई क्रियाएं, इस ग्रह पर मौजूद वृंदावन-धाम, उनके गोलोक वृंदावन ग्रह पर उनकी क्रियाओं से भिन्न नहीं है। यह कहीं भी वृंदावन की उचित प्राप्ति है। कृष्ण चेतना आंदोलन में हमने न्यू वृंदावन गतिविधियों का उद्घाटन किया, जहाँ भक्त हमेशा भगवान की दिव्य प्रेममयी सेवा में लगे रहते हैं, और यह गोलोक वृंदावन से अलग नहीं है। निष्कर्ष यह है कि जो कोई भी श्री चैतन्य महाप्रभु की पंक्ति में सख्ती से कार्य करता है वह संन्यासी को आशीर्वाद देने के योग्य है, भले ही वह गृहस्थ हो। यद्यपि वह एक उच्च पद पर है, फिर भी एक संन्यासी को अभी भी भगवान की सेवा करके अपने आपको दिव्य मंच तक उठाना होगा। अपने वास्तविक व्यवहार से, चैतन्य महाप्रभु ने सर्वभौम भट्टाचार्य का आशीर्वाद लिया। इस तरह उन्होंने यह उदाहरण स्थापित किया कि कैसे एक वैष्णव से उनकी सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना आशीर्वाद की उम्मीद करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)