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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  2.7.66 
अलौकि क वाक्य चेष्टा ताँर ना बुझिया ।
परिहास करियाछि ताँरे ‘वैष्णव’ बलिया ॥66॥
 
 
अनुवाद
"जब मैंने पहली बार रामानंद राय से बात की, तो मुझे एहसास ही नहीं हुआ कि उनके विषय और प्रयास सभी दिव्य रूप से असाधारण थे। मैंने उनका मज़ाक सिर्फ़ इसलिए उड़ाया क्योंकि वे वैष्णव थे।"
 
"When I first spoke to Ramanand Rai, I did not realize that his speech and actions were divine and unusual. I made fun of him because he was a Vaishnav."
तात्पर्य
वैष्णव या परमेश्वर के एकनिष्ठ भक्त न हो, वह भौतिकवादी होना ही चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार रहने वाला वैष्णव निश्चित रूप से भौतिकवादी नहीं होता है। चैतन्य का अर्थ है, "आध्यात्मिक शक्ति"। श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रत्येक कार्य अध्यात्मिक समझ के मंच पर ही हुआ है; इसलिए केवल जो लोग अध्यात्म के मंच पर हैं वही श्री चैतन्य महाप्रभु के कारनामों को समझ पाते हैं। भौतिकवादी लोग इन कारनामों को नहीं समझ पाते और आम तौर पर कर्मी या ज्ञानी कहे जाते हैं। ज्ञानी वे दिमागी सट्टेबाज होते हैं जो बस यह समझने की कोशिश करते हैं कि आत्मा क्या है और पदार्थ क्या है। इनकी प्रक्रिया नेति नेति है: "यह आत्मा नहीं है, यह ब्राह्मण नहीं है"। ज्ञानी उस नीरस कर्मियों से थोड़े अधिक तरक्की वाले होते हैं जो केवल इंद्रियों की संतुष्टि में रुचि रखते हैं। वैष्णव बनने से पहले सर्वभौम भट्टाचार्य एक दिमागी सट्टेबाज (ज्ञानी) थे, और ऐसे होने के नाते वे अक्सर वैष्णवों से मजाक करते रहते थे। वैष्णव ज्ञानियों की सट्टेबाजी प्रणाली के साथ कभी भी सहमत नहीं होते। ज्ञानी और कर्मी दोनों ही अपने अपूर्ण ज्ञान के लिए प्रत्यक्ष इंद्रिय पर ही निर्भर रहते हैं। कर्मी कभी भी ऐसी किसी बात को स्वीकार नहीं करते जो प्रत्यक्ष न हो, और ज्ञानी केवल परिकल्पनाएं ही प्रस्तुत करते रहते हैं। हालाँकि, वैष्णव, जो परमेश्वर के एकनिष्ठ भक्त होते हैं, प्रत्यक्ष इंद्रियों या दिमागी सट्टेबाजी द्वारा ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया का पालन नहीं करते। क्योंकि भक्तमाग परमेश्वर के सेवक होते हैं, इसलिए उन्हें ज्ञान सीधे भगवान के व्यक्तित्व से मिलता है जैसा कि वे भगवद-गीता में बोलते हैं, या कभी-कभी यह उन्हें अंदर से चैत्य-गुरु के रूप में मिलता रहता है। जैसे कि भगवान कृष्ण भगवद-गीता (10.10) में कहते हैं:

तेषां सतत-युक्तनां भजतां प्रीत-पूर्वकम्

ददामी बुद्धि-योगं तं येन मामुपयान्ति ते

"जो लोग लगातार मुझे प्रेम से सेवा करने के लिए समर्पित हैं, मैं उन्हें वह समझ प्रदान करता हूँ जिसके द्वारा वे मेरे पास आ सकते हैं।"

ऐसा माना जाता है कि वेदों को परमेश्वर ने ही उच्चारण किया था। सबसे पहले ब्रह्मा तक यह बोध आया, जो ब्रह्मांड में सबसे पहले बनाया गया प्राणी है (तेने ब्रह्म हृदा या आदि-कवये)। हमारी प्रक्रिया ज्ञान को परंपरा प्रणाली के माध्यम से प्राप्त करना है, कृष्ण से ब्रह्मा तक, नारद, व्यास, श्री चैतन्य महाप्रभु और छह गोस्वामियों तक। गुरु-शिष्य परंपरा से, भगवान ब्रह्मा को मूल पुरुष, कृष्ण से अंदर से बोध मिला था। हमारा ज्ञान गुरु से शिष्य तक हाथों-हाथ मिलने के कारण पूरी तरह से परिपूर्ण है। वैष्णव हमेशा परमेश्वर की सेवा में लीन रहते हैं, और इसलिए न तो कर्मी और न ही ज्ञानी, वैष्णव के कार्यकलापों को समझ सकते हैं। ऐसा कहा जाता है, वैष्णवरा क्रिया-मुद्रा विज्ञेहा ना बुझया: ज्ञान के प्रत्यक्ष अनुभव पर निर्भर करने वाला सबसे विद्वान व्यक्ति भी वैष्णव के कार्यकलापों को नहीं समझ सकता है। श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वैष्णव धर्म में दीक्षा दिए जाने के बाद, सर्वभौम भट्टाचार्य को एहसास हुआ कि उन्होंने रामानंद राय को समझने की कितनी बड़ी गलती की है, जो बहुत विद्वान थे और जिनके सभी प्रयास परमेश्वर को भक्तिभाव में प्रेममय सेवा प्रदान करने के लिए समर्पित थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)