तेषां सतत-युक्तनां भजतां प्रीत-पूर्वकम्
ददामी बुद्धि-योगं तं येन मामुपयान्ति ते
"जो लोग लगातार मुझे प्रेम से सेवा करने के लिए समर्पित हैं, मैं उन्हें वह समझ प्रदान करता हूँ जिसके द्वारा वे मेरे पास आ सकते हैं।"
ऐसा माना जाता है कि वेदों को परमेश्वर ने ही उच्चारण किया था। सबसे पहले ब्रह्मा तक यह बोध आया, जो ब्रह्मांड में सबसे पहले बनाया गया प्राणी है (तेने ब्रह्म हृदा या आदि-कवये)। हमारी प्रक्रिया ज्ञान को परंपरा प्रणाली के माध्यम से प्राप्त करना है, कृष्ण से ब्रह्मा तक, नारद, व्यास, श्री चैतन्य महाप्रभु और छह गोस्वामियों तक। गुरु-शिष्य परंपरा से, भगवान ब्रह्मा को मूल पुरुष, कृष्ण से अंदर से बोध मिला था। हमारा ज्ञान गुरु से शिष्य तक हाथों-हाथ मिलने के कारण पूरी तरह से परिपूर्ण है। वैष्णव हमेशा परमेश्वर की सेवा में लीन रहते हैं, और इसलिए न तो कर्मी और न ही ज्ञानी, वैष्णव के कार्यकलापों को समझ सकते हैं। ऐसा कहा जाता है, वैष्णवरा क्रिया-मुद्रा विज्ञेहा ना बुझया: ज्ञान के प्रत्यक्ष अनुभव पर निर्भर करने वाला सबसे विद्वान व्यक्ति भी वैष्णव के कार्यकलापों को नहीं समझ सकता है। श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वैष्णव धर्म में दीक्षा दिए जाने के बाद, सर्वभौम भट्टाचार्य को एहसास हुआ कि उन्होंने रामानंद राय को समझने की कितनी बड़ी गलती की है, जो बहुत विद्वान थे और जिनके सभी प्रयास परमेश्वर को भक्तिभाव में प्रेममय सेवा प्रदान करने के लिए समर्पित थे।
