एक विषयी वह है जो पारिवारिक जीवन से जुड़ा होता है और केवल पत्नी, बच्चों और सांसारिक आनंद में रुचि रखता है। इंद्रियों को या तो सांसारिक भोग में या भगवान की सेवा में लगाया जा सकता है। जो भगवान की सेवा में नहीं लगे हैं और केवल भौतिक इंद्रिय तृप्ति में रुचि रखते हैं उन्हें विषयी कहा जाता है। श्रील रामानंद राय सरकारी सेवा में लगे हुए थे, और वह करण वर्ग के थे। वे निश्चित रूप से भगवा वस्त्रधारी संन्यासी नहीं थे, फिर भी वह एक परमहंस गृहस्थ की पारलौकिक स्थिति में थे। चैतन्य महाप्रभु का शिष्य बनने से पहले, सर्वभौम भट्टाचार्य रामानंद राय को एक साधारण विषयी मानते थे क्योंकि वह सरकारी सेवा में लगे गृहस्थ थे। हालाँकि, जब भट्टाचार्य को वास्तव में वैष्णव दर्शन में ज्ञान प्राप्त हुआ, तो वह श्री रामानंद राय की उत्कृष्ट पारलौकिक स्थिति को समझ सके; इसलिए उन्होंने उन्हें अधिकारी के रूप में संदर्भित किया। एक अधिकारी वह होता है जो कृष्ण के पारलौकिक विज्ञान को जानता है और उनकी सेवा में लगा रहता है; इसलिए सभी गृहस्थ भक्तों को दास अधिकारी के रूप में नामित किया जाता है।
