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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  2.7.63 
शूद्र विषयि - ज्ञाने उपेक्षा ना करिबे ।
आमार वचने ताँरे अवश्य मिलिबे ॥63॥
 
 
अनुवाद
"कृपया यह सोचकर उसकी उपेक्षा न करें कि वह भौतिक कार्यों में संलग्न एक शूद्र परिवार का है। मेरी प्रार्थना है कि आप उससे अवश्य मिलें।"
 
"Please do not ignore him, thinking he is a Shudra preoccupied with material pursuits. I request you to meet him."
तात्पर्य
वर्णाश्रम-धर्म में शूद्र सामाजिक स्थिति में चौथा विभाजन है। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभाव-जम (भगवद् गीता 18.44)। शूद्रों का उद्देश्य तीनों उच्च वर्ग - ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना है। श्री रामानंद राय करण वर्ग से संबंधित थे, जो कि बंगाल में कायस्थ वर्ग के समकक्ष हैं। इस वर्ग को पूरे भारत में शूद्र माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि बंगाली कायस्थ मूल रूप से उत्तर भारत से बंगाल आने वाले ब्राह्मणों के सेवक के रूप में लगे हुए थे। बाद में, लिपिक वर्ग बंगाल में कायस्थ बन गया। अब कायस्थ के नाम से कई मिश्रित वर्ग हैं। कभी-कभी बंगाल में कहा जाता है कि जो लोग किसी विशेष वर्ग का दावा नहीं कर सकते वे कायस्थ वर्ग से संबंधित होते हैं। हालाँकि इन कायस्थों या करणों को शूद्र माना जाता है, लेकिन वे बहुत बुद्धिमान और उच्च शिक्षित हैं। उनमें से ज्यादातर वकील या राजनेता जैसे पेशेवर हैं। इस प्रकार बंगाल में कायस्थों को कभी-कभी क्षत्रिय माना जाता है। हालाँकि, ओडिशा में करणों सहित कायस्थ वर्ग को शूद्र श्रेणी में माना जाता है। श्रील रामानंद राय इस करण वर्ग के थे; इसलिए उन्हें शूद्र माना जाता था। वे ओडिशा के महाराजा प्रतापरुद्र के शासनकाल में दक्षिण भारत के राज्यपाल भी थे। दूसरे शब्दों में, सर्वभौम भट्टाचार्य ने भगवान चैतन्य महाप्रभु को सूचित किया कि रामानंद राय, यद्यपि शूद्र वर्ग से संबंधित हैं, एक उच्च जिम्मेदार सरकारी अधिकारी थे। जहाँ तक आध्यात्मिक उन्नति का संबंध है, भौतिकवादी, राजनेता और शूद्र आमतौर पर अयोग्य हैं। इसलिए सर्वभौम भट्टाचार्य ने अनुरोध किया कि भगवान चैतन्य महाप्रभु रामानंद राय की उपेक्षा ना करें, जो कि आध्यात्मिक रूप से अत्यधिक उन्नत थे यद्यपि वह एक शूद्र और भौतिकवादी थे।

एक विषयी वह है जो पारिवारिक जीवन से जुड़ा होता है और केवल पत्नी, बच्चों और सांसारिक आनंद में रुचि रखता है। इंद्रियों को या तो सांसारिक भोग में या भगवान की सेवा में लगाया जा सकता है। जो भगवान की सेवा में नहीं लगे हैं और केवल भौतिक इंद्रिय तृप्ति में रुचि रखते हैं उन्हें विषयी कहा जाता है। श्रील रामानंद राय सरकारी सेवा में लगे हुए थे, और वह करण वर्ग के थे। वे निश्चित रूप से भगवा वस्त्रधारी संन्यासी नहीं थे, फिर भी वह एक परमहंस गृहस्थ की पारलौकिक स्थिति में थे। चैतन्य महाप्रभु का शिष्य बनने से पहले, सर्वभौम भट्टाचार्य रामानंद राय को एक साधारण विषयी मानते थे क्योंकि वह सरकारी सेवा में लगे गृहस्थ थे। हालाँकि, जब भट्टाचार्य को वास्तव में वैष्णव दर्शन में ज्ञान प्राप्त हुआ, तो वह श्री रामानंद राय की उत्कृष्ट पारलौकिक स्थिति को समझ सके; इसलिए उन्होंने उन्हें अधिकारी के रूप में संदर्भित किया। एक अधिकारी वह होता है जो कृष्ण के पारलौकिक विज्ञान को जानता है और उनकी सेवा में लगा रहता है; इसलिए सभी गृहस्थ भक्तों को दास अधिकारी के रूप में नामित किया जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)