कृष्ण उपदेशि’ कर जीवेर निस्तार ।
अचिराते कृष्ण तोमा करिबेन अङ्गीकार ॥148॥
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अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने वासुदेव को कृष्ण का उपदेश देने और इस प्रकार जीवों को मुक्ति दिलाने की सलाह भी दी। परिणामस्वरूप, कृष्ण ने शीघ्र ही उन्हें अपना भक्त स्वीकार कर लिया।
Sri Chaitanya Mahaprabhu also advised Vasudeva to preach about Krishna and thus save living beings. As a result, Krishna would soon accept him as His devotee.
तात्पर्य
वासुदेव विप्र कोढ़ी थे और बहुत पीड़ित थे, फिर भी वह श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसे चंगा किया, तो उन्होंने उसे कृष्ण-चेतना प्रचार करने का निर्देश दिया। वास्तव में, भगवान केवल वासुदेव से चाहते थे कि कृष्ण के निर्देशों का प्रचार करें और सभी लोगों को मुक्त करें। यह कृष्ण चेतना के लिए अंतर्राष्ट्रीय समाज की प्रक्रिया है। इस समाज के प्रत्येक सदस्य को एक बहुत ही घृणित स्थिति से बचाया गया था, लेकिन अब वे कृष्ण चेतना के पंथ का प्रचार करने में लगे हुए हैं। वे न केवल भौतिकवाद नामक बीमारी से ठीक हो गए हैं, बल्कि एक बहुत ही खुशहाल जीवन भी जी रहे हैं। हर कोई उन्हें कृष्ण के महान भक्तों के रूप में स्वीकार करता है, और उनके गुण उनके चेहरे पर ही प्रकट होते हैं। यदि कोई कृष्ण द्वारा भक्त के रूप में पहचाना जाना चाहता है, तो उसे श्री चैतन्य महाप्रभु की सलाह का पालन करते हुए उपदेश का काम करना चाहिए। तब निस्संदेह वह बिना देर किए श्री कृष्ण चैतन्य के चरण कमलों को प्राप्त करेगा, स्वयं भगवान कृष्ण।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥