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श्लोक 2.7.142  |
प्रभुर कृपा देखि’ ताँर विस्मय हैल मन ।
श्लोक प ड़ि’ पाये धरि, करये स्तवन ॥142॥ |
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| अनुवाद |
| श्री चैतन्य महाप्रभु की अद्भुत कृपा देखकर ब्राह्मण वासुदेव आश्चर्यचकित हो गए और उन्होंने भगवान के चरणकमलों का स्पर्श करते हुए श्रीमद्भागवत का एक श्लोक सुनाना आरम्भ किया। |
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| That Brahmin was astonished to see the wonderful grace of Vasudeva Sri Chaitanya Mahaprabhu and after touching the lotus feet of Mahaprabhu, he started reciting a verse from Srimad Bhagavatam. |
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