श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  2.7.125 
मोर भाग्येर सीमा ना याय कहन ।
आजि मोर श्लाघ्य हैल जन्म - कुल - धन ॥125॥
 
 
अनुवाद
"हे प्रभु, मेरे महान सौभाग्य की कोई सीमा नहीं है। इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। आज मेरा परिवार, जन्म और धन-संपत्ति, सब गौरवशाली हो गए हैं।"
 
"O Lord, my great fortune knows no bounds. It cannot be described. Today my family, my birth, and my wealth are all blessed."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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