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श्लोक 12
श्लोक
2.7.12
सेतुबन्ध हैते आमि ना आसि यावत् ।
नीलाचले तुमि सब रहिबे तावत् ॥12॥
अनुवाद
“जब तक मैं सेतुबंध से वापस न आ जाऊं, तब तक आप सभी प्रिय मित्र जगन्नाथ पुरी में ही रहें।”
“Until I return from Setubandha, all of you stay in Jagannath Puri.”
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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