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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  2.7.113 
एइ - मत याइते याइते गेला कूर्म - स्थाने ।
कूर्म देखि’ कैल ताँरे स्तवन - प्रणामे ॥113॥
 
 
अनुवाद
जब भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु कूर्मक्षेत्र नामक पवित्र स्थान पर आये, तो उन्होंने विग्रह के दर्शन किये तथा प्रार्थना और वंदना की।
 
When Sri Chaitanya Mahaprabhu reached the pilgrimage site of Kurmakshetra, he saw the Deity, praised it and offered his obeisances.
तात्पर्य
कुर्म-स्थान तीर्थ का एक सुपरिचित स्थल है। वहाँ कुर्मदेव का मंदिर है। प्रपन्नार्मृत में कहा गया है कि भगवान जगन्नाथ जगन्नाथ पुरी से श्री रामानुजाचार्य को ले गये थे और एक रात को उन्हें कुर्म-क्षेत्र में फेंक दिया था। कुर्म-क्षेत्र भारत में दक्षिण रेलवे की लाइन पर स्थित है। किसी को भी श्रीकाकुलम रोड नामक रेलवे स्टेशन पर जाना पड़ता है। इस स्टेशन से कोई आठ मील पूर्व की ओर चलकर कुर्माचल नामक पवित्र स्थल पर पहुँच जाएगा। जो लोग तेलुगू भाषा बोलते हैं वे इस पवित्र स्थल को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। गंजाम मैनुअल नामक राजकीय राजपत्र में इस वक्तव्य को दर्ज़ किया गया है। वहाँ कुर्म की देवता है और जैसा कि ऊपर बताया गया है, श्रीला रामानुजाचार्य को जगन्नाथ पुरी से इस जगह पर फेंक दिया गया था। उस समय उन्होंने सोचा कि कुर्म की देवता भगवान शिव की देवता है; इसलिए वे वहाँ उपवास पर थे। बाद में, जब उन्हें समझ आया कि कुर्म-मूर्ति भगवान विष्णु का ही एक और रूप है, तो उन्होंने भगवान कुर्म की बहुत भव्य उपासना की स्थापना की। यह वक्तव्य प्रपन्नार्मृत (अध्याय छत्तीस) में मिलता है। कुर्म-क्षेत्र या कुर्म-स्थान के पवित्र स्थल को वास्तव में जगन्नाथ पुरी में भगवान जगन्नाथ-देव के प्रभाव में श्रीपाद रामानुजाचार्य ने फिर से स्थापित किया था। बाद में मंदिर विजय-नगर के राजा के अधिकार क्षेत्र में आ गया। वैष्णवों द्वारा माधवाचार्य-सम्प्रदाय के लिए देवता की आराधना की जाती थी। मंदिर में कुछ शिलालेख हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे श्री नरहरि तीर्थ ने लिखे थे, जो माधवाचार्य के शिष्य-परंपरा में थे। श्रीला भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर उन शिलालेखों की व्याख्या इस प्रकार करते हैं: (१) श्री पुरुषोत्तम यति कई विद्वानों के गुरु के रूप में प्रकट हुए थे। वे भगवान विष्णु के बहुत प्रिय भक्त थे। (२) उनके उपदेश को पूरे विश्व में बहुत आदर के साथ स्वीकार किया गया था और अपनी शक्ति से उन्होंने कई नास्तिकों को प्रबल तर्क और न्याय से मुक्त कराया था। (३) उन्होंने आनंद तीर्थ की दीक्षा ली और कई मूर्खों को सन्यास स्वीकार करने के लिए परिवर्तित किया और उन्हें अपनी लाठी से दंड दिया। (४) उनके सभी लेख और शब्द बहुत शक्तिशाली हैं। उन्होंने लोगों को भगवान विष्णु की भक्ति सेवा दी ताकि उनका उद्धार हो सके और वे आध्यात्मिक दुनिया में जा सकें। (५) भक्ति सेवा में उनके निर्देश किसी भी व्यक्ति को भगवान के चरण-कमलों तक ऊपर उठाने में सक्षम थे। (६) नरहरि तीर्थ को भी उनके द्वारा दीक्षित किया गया था और वे कलिंग प्रांत के शासक बने। (७) नरहरि तीर्थ ने शबरों से युद्ध किया, जो चांडाल या शिकारी थे और इस प्रकार कुर्म के मंदिर को बचाया। (८) नरहरि तीर्थ एक बहुत धार्मिक और शक्तिशाली राजा थे। (९) शक संवत १२०३ में, वैशाख माह में, शुक्ल पक्ष में, एकादशी के दिन, नरहरि तीर्थ ने अपने आदेश पर बनाए गए मंदिर को योगानंद नृसिंहदेव के पवित्र नाम को समर्पित किया। [टैबलेट उसी दिन की है, जो शनिवार, मार्च 29, 1281 ई. को थी।]
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)