श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.7.111 
अलौकिक - लीलाय यार ना हय विश्वास ।
इह - लोक, पर - लोक तार हय नाश ॥111॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई भगवान की असाधारण दिव्य लीलाओं में विश्वास नहीं करता, तो वह इस लोक में तथा परलोक में भी पराजित होता है।
 
One who does not believe in the extraordinary divine pastimes of Mahaprabhu is destroyed both in this world and the next.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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