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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 7: महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत की यात्रा  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  2.7.109 
नवद्वीपे येइ शक्ति ना कैला प्रकाशे ।
से शक्ति प्रका शि’ निस्तारिल दक्षिण - देशे ॥109॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी आध्यात्मिक शक्तियों को नवद्वीप में प्रकट नहीं किया, अपितु उन्होंने उन्हें दक्षिण भारत में प्रकट किया तथा वहाँ के सभी लोगों को मुक्ति प्रदान की।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu did not manifest His spiritual power in Navadvipa, but He manifested it in South India and saved all the people there.
तात्पर्य
उस समय नवद्वीप, जो भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की जन्मभूमि भी था, धार्मिक स्थल पर कई स्मार्त (वैदिक कर्मकांडों के भक्तिपूर्ण अनुयायी) थे। स्मृति-शास्त्र के अनुयायियों को स्मार्त कहा जाता है। उनमें से अधिकांश भक्त नहीं होते हैं, और उनका मुख्य व्यापार ब्राह्मणवादी सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना है। हालाँकि, उनके व्यक्तिपरक सेवा में कोई ज्ञान नहीं है। नवद्वीप में सभी विद्वान स्मृति-शास्त्र के अनुयायी हैं, और भगवान चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें बदलने का प्रयास नहीं किया। इसलिए लेखक ने टिप्पणी की है कि आध्यात्मिक शक्ति भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने नवद्वीप पर प्रकट नहीं की थी जो उनके अनुग्रह से दक्षिण भारत में प्रकट हुई थी। इस प्रकार वहाँ सब कोई वैष्णव बन गया। इससे यह समझा जाता है कि लोग वास्तव में अनुकूल स्थिति में प्रचार करने में रुचि रखते हैं। यदि धर्मांतरण के उम्मीदवार बहुत परेशान करने वाले हैं, तो एक उपदेशक उनके बीच कृष्ण चेतना फैलाने का प्रयास नहीं कर सकता है। जहाँ स्थिति अधिक अनुकूल हो वहाँ जाना बेहतर है। इस कृष्ण चेतना आंदोलन का प्रथम प्रयास भारत में हुआ था, लेकिन भारत के लोग राजनीतिक विचारों में लीन होकर इसे स्वीकार नहीं कर पाए। वे राजनीतिक नेताओं से मोहित थे। इसलिए, हमने अपने आध्यात्मिक गुरु के आदेश का पालन करते हुए, पश्चिम आना पसंद किया, और भगवान चैतन्य महाप्रभु की कृपा से यह आंदोलन सफल हो रहा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)