Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  2.6.99 
कलि - युगे लीलावतार ना करे भगवान् ।
अतएव ‘त्रि - युग’ करि’ कहि तार नाम ॥99॥
 
 
अनुवाद
"इस कलियुग में भगवान का कोई लीला-अवतार नहीं है; इसलिए उन्हें त्रियुग कहा जाता है। यह उनके पवित्र नामों में से एक है।"
 
“In this Kaliyuga there is no pastime of the Supreme Personality of Godhead; therefore He is called Triyuga, and this is one of His holy names.”
तात्पर्य
लीलावतार प्रभु का अवतार होता है जो विशेष प्रयास किये बिना ही विविध कार्यकलापों को संपन्न करते हैं। उनके पास हमेशा एक समयवर्ती लीला के बाद दूसरी लीला होती है, सभी दिव्य आनंदमयी होती हैं और ये सब समयवर्ती लीलाएँ केवल सर्वोच्च व्यक्ति के नियंत्रण में होती हैं। इन लीलाओं में सर्वोच्च व्यक्ति सभी से पूरी तरह से स्वतंत्र होते हैं। श्री सनातन गोस्वामी (च.च. माध्य 20.296-298) को शिक्षा देते समय, श्री चैतन्य महाप्रभु ने बताया कि कोई भी लीलावतारों की संख्या नहीं गिन सकता:

लीलावतार कृष्णर ना याय गणना

प्रधान करिया कहि दिगदर्शन

"हालाँकि," भगवान ने सनातन को बताया, "मैं मुख्य लीलावतारों के बारे में समझाऊंगा।"

मत्स्य, कूर्म, रघुनाथ, नृसिंह, वामन

वराहादि - लेखा याँर ना याय गणना

इस प्रकार भगवान के अवतारों को गिना गया, जिसमें मत्स्य, मछली अवतार; कूर्म, कछुआ; भगवान रामचंद्र; नरसिंहदेव; वामनदेव; और वराह, सूअर के अवतार शामिल हैं। इस प्रकार लीलावतार अनगिनत हैं और ये सभी अद्भुत लीलाएँ प्रदर्शित करते हैं। भगवान वराह, सूअर के अवतार ने पूरे पृथ्वी ग्रह को गरभोदक महासागर की गहराई से उठा लिया। कछुआ अवतार, भगवान कूर्म, पूरे समुद्र को पायसीकृत करने के लिए एक धुरी बन गए, और भगवान नरसिंहदेव आधे-मानव, आधे-शेर के रूप में प्रकट हुए। ये लीलावतारों की कुछ अद्भुत और असामान्य विशेषताएँ हैं।

अपनी पुस्तक लघु-भागवतामृत में, श्रील रूप गोस्वामी ने निम्नलिखित पच्चीस लीलावतारों का उल्लेख किया है: चतुः-सन, नारद, वराह, मत्स्य, यज्ञ, नर-नारायण, कपिल, दत्तात्रेय, हयशीर्ष (हयग्रीव), हंस, पृश्नगर्भ, ऋषभ, पृथु, नृसिंह, कूर्म, धन्वंतरि, मोहिनी, वामन, परशुराम, राघवेंद्र, व्यास, बलराम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि।

श्री चैतन्य महाप्रभु को लीलावतार के रूप में वर्णित नहीं किया गया है क्योंकि वे छद्म अवतार (छन्न-अवतार) हैं। कलियुग में लीलावतार नहीं होते, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में भगवान का अवतार होता है। श्रीमद-भागवतम में इसे समझाया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)