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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  2.6.92 
देखिले ना देखे तारे बहिर्मुख जन” ।
शुनि’ हासि’ सार्वभौम बलिल वचन ॥92॥
 
 
अनुवाद
"बाह्य ऊर्जा से प्रभावित व्यक्ति को बहिर्मुख जन कहा जाता है, क्योंकि अपनी अनुभूति के बावजूद, वह वास्तविक पदार्थ को नहीं समझ सकता।" गोपीनाथ आचार्य को यह कहते हुए सुनकर, सार्वभौम भट्टाचार्य मुस्कुराए और इस प्रकार बोलने लगे।
 
"A person influenced by external energy is called an external person, or a worldly person, because even after seeing, he cannot understand the real thing." Hearing Gopinath Acharya's words, Sarvabhauma Bhattacharya smiled and said this.
तात्पर्य
जब किसी के हृदय का शोधन नहीं होता, तब वह भक्ति सेवा के दिव्य स्वरूप को नहीं जगा सकता। जैसा कि भगवान कृष्ण भगवद्गीता (7.28) में बताते हैं:

येषां त्वन्त-गतं पापं जननां पुण्य-कर्माणां

ते द्वन्द्व-मोह-नर्मुक्ता भजन्ते मामृढ़-व्रताः

"जो लोग पिछले और इस जन्म में सत्कर्म कर चुके हैं और जिनके पाप कर्म पूर्ण रूप से समाप्त हो चुके हैं, वे भ्रम के द्वैत से मुक्त होकर दृढ़ता के साथ मेरी सेवा करते हैं।"

जब कोई वास्तव में शुद्ध भक्ति सेवा में संलग्न होता है, तो यह समझा जाता है कि वह पहले ही सभी पाप कर्मों के परिणामों से मुक्ति पा चुका है। दूसरे शब्दों में, यह समझा जाना चाहिए कि भक्त पहले ही पाप से मुक्त हैं। एक पापी व्यक्ति, एक दुष्ट (दुष्कृति), भक्ति सेवा में संलग्न नहीं हो सकता। और न ही कोई केवल विद्वत्तापूर्ण अटकलों के आधार पर भक्ति सेवा में संलग्न हो सकता है। शुद्ध भक्ति सेवा प्रदान करने के लिए उसे भगवान की दया की प्रतीक्षा करनी होगी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)