येषां त्वन्त-गतं पापं जननां पुण्य-कर्माणां
ते द्वन्द्व-मोह-नर्मुक्ता भजन्ते मामृढ़-व्रताः
"जो लोग पिछले और इस जन्म में सत्कर्म कर चुके हैं और जिनके पाप कर्म पूर्ण रूप से समाप्त हो चुके हैं, वे भ्रम के द्वैत से मुक्त होकर दृढ़ता के साथ मेरी सेवा करते हैं।"
जब कोई वास्तव में शुद्ध भक्ति सेवा में संलग्न होता है, तो यह समझा जाता है कि वह पहले ही सभी पाप कर्मों के परिणामों से मुक्ति पा चुका है। दूसरे शब्दों में, यह समझा जाना चाहिए कि भक्त पहले ही पाप से मुक्त हैं। एक पापी व्यक्ति, एक दुष्ट (दुष्कृति), भक्ति सेवा में संलग्न नहीं हो सकता। और न ही कोई केवल विद्वत्तापूर्ण अटकलों के आधार पर भक्ति सेवा में संलग्न हो सकता है। शुद्ध भक्ति सेवा प्रदान करने के लिए उसे भगवान की दया की प्रतीक्षा करनी होगी।
