इस प्रकार वेद बताते हैं कि परम सत्य में अलग-अलग शक्तियाँ हैं। जब कोई परम सत्य की शक्तियों की विशेषताओं को समझता है, तो वह परम सत्य से अवगत हो जाता है। भौतिक प्लेटफ़ॉर्म पर भी, कोई इसके लक्षणों की अभिव्यक्ति से पदार्थ को समझ सकता है। उदाहरण के लिए, जब गर्मी होती है, तो समझना होगा कि आग है। आग की गर्मी को सीधे तौर पर महसूस किया जाता है। आग दिखाई नहीं दे सकती है, लेकिन कोई गर्मी को महसूस करके आग को ढूंढ सकता है। इसी तरह, यदि कोई परम सत्य की विशेषताओं को समझ सकता है, तो हम जान सकते हैं कि उसने भगवान की दया से परम सत्य के सार को समझा है।
भगवद-गीता (7.25) में कहा गया है, नाहं प्रकाशः सर्वस्य: सर्वोच्च भगवान् व्यक्तित्व सभी के सामने प्रकट न होने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं। सेवोनमुखे हि जिह्वादौ स्वयं एव स्फुरत्यदः: "भगवान स्वयं को एक भक्त को तब प्रकट करता है जब वह भक्त की सेवा से पूरी तरह संतुष्ट होता है।" इस प्रकार कोई भी भगवान की दया के बिना परमेश्वर को समझ नहीं सकता। परम सत्य को अटकलों से नहीं समझा जा सकता, और यह भगवद्गीता का निष्कर्ष है।
