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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  2.6.84 
अथापि ते देव पदाम्बुज - द्वय - प्रसाद - लेशानुगृहीत एव हि ।
जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन् ॥84॥
 
 
अनुवाद
"हे प्रभु, यदि किसी पर आपके चरणकमलों की थोड़ी सी भी कृपा हो, तो वह आपके व्यक्तित्व की महानता को समझ सकता है। किन्तु जो लोग भगवान को समझने के लिए चिंतन करते हैं, वे आपको जानने में असमर्थ रहते हैं, भले ही वे अनेक वर्षों तक वेदों का अध्ययन करते रहें।"
 
"O Lord, if anyone receives even the slightest grace from Your lotus feet, he can understand Your greatness. But those who engage in arguments to understand the Supreme Personality of Godhead remain incapable of knowing You even after studying the Vedas for many years."
तात्पर्य
उपरोक्त पद्य श्रीमद-भागवतम (10.14.29) से है। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, वेदेषु दुर्लभमदूर्लभम आत्म-भक्तौ (ब्र। सं। 5.33)। यद्यपि परम पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण ज्ञान का परम लक्ष्य हैं (वेदैश्च सर्वैरहं एव वेद्यः), किन्तु, जो शुद्ध भक्त नहीं है और जो भगवान के सेवा कार्य में संलग्न नहीं है, वह उन्हें समझ नहीं सकता। इसलिये भगवान ब्रह्मा इस बात की पुष्टि करते हैं। वेदेषु दुर्लभम: "परमेश्वर को केवल अध्ययन से समझ पाना बहुत कठिन है।" आत्म-भक्तौ: "किन्तु, भक्तों के लिये प्रभु को प्राप्त करना बहुत सरल है।" भगवान को अजित भी कहा गया है (अजेय)। कोई परम पुरुषोत्तम भगवान को नहीं जीत सकता लेकिन प्रभु स्वयं भक्तों द्वारा विजित होने की अनुमति देते हैं। यही उनका स्वभाव है। जैसा कि पद्म पुराण में कहा गया है:

अतः श्री-कृष्ण-नामादि न भवेद ग्रह्यम इन्द्रियैः

सेवनमुखे हि जिह्वादौ स्वयं एव स्फुरत्यदः

भक्ति कार्यों से प्रसन्न होकर भगवान स्वयं को भक्तों के समक्ष प्रकट करते हैं। उन्हें समझने का यही मार्ग है।

श्रीमद-भागवतम से गोकुलनाथ आचार्य द्वारा उद्धृत किया गया पद्य मूल रूप से भगवान ब्रह्मा ने तब बोला था जब उन्हें भगवान कृष्ण ने पराजित किया था। भगवान ब्रह्मा ने कृष्ण की शक्ति का परीक्षण करने के लिये सभी बछड़ों व ग्वाल-बालों को चुरा लिया था। भगवान ब्रह्मा ने स्वीकार किया कि ब्रह्मांड के भीतर उनकी अपनी असाधारण शक्तियाँ भगवान कृष्ण की असीम शक्तियों के समक्ष तुलनीय भी नहीं हैं। यदि भगवान ब्रह्मा कृष्ण को समझने की भूल कर सकते हैं तो सामान्य मनुष्यों के बारे में क्या कहा जा सकता है, जो या तो कृष्ण को गलत समझते हैं या अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिये कृष्ण के एक तथाकथित अवतार को प्रस्तुत करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)