अतः श्री-कृष्ण-नामादि न भवेद ग्रह्यम इन्द्रियैः
सेवनमुखे हि जिह्वादौ स्वयं एव स्फुरत्यदः
भक्ति कार्यों से प्रसन्न होकर भगवान स्वयं को भक्तों के समक्ष प्रकट करते हैं। उन्हें समझने का यही मार्ग है।
श्रीमद-भागवतम से गोकुलनाथ आचार्य द्वारा उद्धृत किया गया पद्य मूल रूप से भगवान ब्रह्मा ने तब बोला था जब उन्हें भगवान कृष्ण ने पराजित किया था। भगवान ब्रह्मा ने कृष्ण की शक्ति का परीक्षण करने के लिये सभी बछड़ों व ग्वाल-बालों को चुरा लिया था। भगवान ब्रह्मा ने स्वीकार किया कि ब्रह्मांड के भीतर उनकी अपनी असाधारण शक्तियाँ भगवान कृष्ण की असीम शक्तियों के समक्ष तुलनीय भी नहीं हैं। यदि भगवान ब्रह्मा कृष्ण को समझने की भूल कर सकते हैं तो सामान्य मनुष्यों के बारे में क्या कहा जा सकता है, जो या तो कृष्ण को गलत समझते हैं या अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिये कृष्ण के एक तथाकथित अवतार को प्रस्तुत करते हैं।
