श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  2.6.75 
निरन्तर इँहाके वेदान्त शुनाइब ।
वैराग्य - अद्वैत - मार्गे प्रवेश कराइब ॥75॥
 
 
अनुवाद
“मैं चैतन्य महाप्रभु के समक्ष निरंतर वेदान्त दर्शन का पाठ करूंगा, ताकि वे अपने त्याग में स्थिर रहें और इस प्रकार अद्वैतवाद के मार्ग पर प्रवेश करें।”
 
“I will constantly teach them the philosophy of Vedanta, so that they may remain steadfast in their detachment and thus enter the path of Advaita.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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