निरन्तर इँहाके वेदान्त शुनाइब ।
वैराग्य - अद्वैत - मार्गे प्रवेश कराइब ॥75॥
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अनुवाद
“मैं चैतन्य महाप्रभु के समक्ष निरंतर वेदान्त दर्शन का पाठ करूंगा, ताकि वे अपने त्याग में स्थिर रहें और इस प्रकार अद्वैतवाद के मार्ग पर प्रवेश करें।”
“I will constantly teach them the philosophy of Vedanta, so that they may remain steadfast in their detachment and thus enter the path of Advaita.”
तात्पर्य
सर्वभौम भट्टाचार्य के अनुसार, संन्यासियों में वेदांत दर्शन का अध्ययन इंद्रिय सुख से विमुख होने में मदद करता है। इस प्रकार एक संन्यासी कमर पर शेरवानी (कौपीन) को पहनने की प्रतिष्ठा की रक्षा कर सकता है। व्यक्ति को इंद्रियों, मन पर नियंत्रण करना होता है और वाणी, मन, क्रोध, जीभ, पेट और जननांग की छह शक्तियों को वश में करना होता है। तभी वह भगवान की भक्ति सेवा को समझने में पारंगत हो सकता है और इस प्रकार एक सिद्ध संन्यासी बन सकता है। उस उद्देश्य के लिए व्यक्ति को ज्ञान और वैराग्य का नियमित रूप से पालन करना चाहिए। जब व्यक्ति भौतिक इंद्रिय तृप्ति से जुड़ा होता है, तो वह अपने संन्यास आदेश की रक्षा नहीं कर सकता है। सर्वभौम भट्टाचार्य ने सुझाव दिया कि वैराग्य (त्याग) के अध्ययन से श्री चैतन्य महाप्रभु को पूर्ण विकसित युवा इच्छाओं के चंगुल से बचाया जा सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥