इन सभी संन्यासियों की ब्रह्मचारियों द्वारा सहायता की जाती है, जिनका वर्णन इस प्रकार है: जो अपनी वास्तविक पहचान जानता है और अपने विशेष व्यावसायिक कर्तव्य में निश्चित है, जो हमेशा आध्यात्मिक समझ में खुश रहता है, उसे स्वरूप-ब्रह्मचारी कहा जाता है। जो ब्रह्म तेज को पूरी तरह से जानता है और हमेशा योग के अभ्यास में लगा रहता है उसे प्रकाश-ब्रह्मचारी कहा जाता है। जिसने निरपेक्ष ज्ञान प्राप्त किया है और जो हमेशा परम सत्य, ज्ञान, असीमित और ब्रह्म तेज का ध्यान करता है, इस प्रकार खुद को अलौकिक आनंद में रखता है, उसे आनंद-ब्रह्मचारी कहा जाता है। जो पदार्थ और आत्मा के बीच अंतर करने में सक्षम है, जो भौतिक परिवर्तनों से कभी विचलित नहीं होता है और जो असीमित, अक्षय, शुभ ब्रह्म तेज का ध्यान करता है, वह प्रथम श्रेणी का, विद्वान ब्रह्मचारी है और उसे चैतन्य नाम दिया गया है।
जब सर्वभौम भट्टाचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु के संन्यास समुदाय के बारे में गोपीनाथ आचार्य से बात कर रहे थे, तो उन्होंने पहले नाम "श्री कृष्ण" की सराहना की, लेकिन उपनाम "चैतन्य" को पसंद नहीं किया, जो भारती समुदाय के एक ब्रह्मचारी का नाम है। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि भगवान को सरस्वती समुदाय में ऊपर उठाया जाए। हालाँकि, गोपीनाथ आचार्य ने बताया कि भगवान किसी बाहरी औपचारिकता पर निर्भर नहीं करते। गोपीनाथ आचार्य का दृढ़ विश्वास था कि श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं कृष्ण हैं और इसलिए किसी भी बाहरी अनुष्ठान या औपचारिकता से स्वतंत्र हैं। यदि कोई शुद्ध भक्ति सेवा में संलग्न होना चाहता है, तो उसे भारती या सरस्वती के रूप में नाममात्र की श्रेष्ठता की आवश्यकता नहीं है।
