श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  2.6.63 
प्रभु कहे, - ‘मन्दिर भितरे ना याइब ।
गरुड़ेर पाशे र हि’ दर्शन करि ब’ ॥63॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने कहा, "मैं कभी भी मंदिर में प्रवेश नहीं करूंगा, बल्कि हमेशा गरुड़-स्तंभ की ओर से भगवान का दर्शन करूंगा।"
 
Mahaprabhu said, "I will never go inside the temple again. I will always have darshan of the Lord from near the Garuda pillar."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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