श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  2.6.62 
भट्टाचार्य कहे , - एकले तुमि ना याइह दर्शने ।
आमार सङ्गे याबे, किम्वा आमार लोक - सने ॥62॥
 
 
अनुवाद
भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, "जगन्नाथ मंदिर में विग्रह के दर्शन के लिए अकेले मत जाओ। बेहतर होगा कि तुम मेरे साथ या मेरे आदमियों के साथ जाओ।"
 
Bhattacharya replied, "You should not go alone to the Jagannath Temple to see the Deity. It would be better if you go either with me or with my people."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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