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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.6.58 
तुमि जगद्गुरु - सर्वलोक - हित - कर्ता ।
वेदान्त पड़ाओ, सन्न्यासीर उपकर्ता ॥58॥
 
 
अनुवाद
"क्योंकि आप वेदान्त दर्शन के आचार्य हैं, अतः आप संसार के सभी लोगों के स्वामी और उनके शुभचिंतक भी हैं। आप सभी प्रकार के संन्यासियों के भी कल्याणकारी हैं।
 
"Because you are a teacher of Vedanta philosophy, you are the guru and well-wisher of all the people of the world. You also benefit all the monks."
तात्पर्य
क्योंकि मायावादी सन्यासी वेदांत दर्शन अपने शिष्यों अथवा अनुयायियों को सिखाते हैं, इसलिए रूढ़िगत रूप से इन्हें जगद्गुरु कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि ये समस्त लोगों के उपकारी हैं। यद्यपि सर्वभौम भट्टाचार्य सन्यासी न होकर गृहस्थ थे, किन्तु वे सभी सन्यासियों को अपने घर में निमंत्रित करके उन्हें प्रसाद भेंट करते थे। इस प्रकार उन्हें समस्त सन्यासियों का श्रेष्ठ हितैषी और मित्र माना गया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)