सन्यासियों में, जो आध्यात्मिक जीवन के चौथे पटल पर हैं, परस्पर सम्मान प्रकट करने का शिष्टाचार है, इसे यह कहते हुए 'ओम नमो नारायणाय' ("मैं नारायण को अपना सम्मानपूर्वक प्रणाम करता हूँ")। इस अभिवादन का उपयोग मायावादी सन्यासी विशिष्ट रूप से करते हैं। स्मृति शास्त्रों के अनुसार, एक सन्यासी को किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए और न ही उसे खुद को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के समान समझना चाहिए। वैष्णव सन्यासी कभी अपने आपको भगवान से अभिन्न नहीं मानते; वे हमेशा अपने आपको कृष्ण के शाश्वत सेवक मानते हैं और वे चाहते हैं कि दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति कृष्णभावनापूर्ण बन जाए। इस कारण से, एक वैष्णव सन्यासी हमेशा प्रत्येक व्यक्ति को अपना आशीर्वाद देते हुए यह कहता है कि कृष्णे मतित्वस्तु ("आप कृष्णभावनामृत हो सकते हैं")।
