श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 276
 
 
श्लोक  2.6.276 
मुक्ति - शब्द कहिते मने हय घृणा - त्रास ।
भक्ति - शब्द कहिते मने हय त’ उल्लास ॥276॥
 
 
अनुवाद
"'मुक्ति' शब्द का उच्चारण मात्र से ही घृणा और भय उत्पन्न होता है, लेकिन जब हम 'भक्ति' शब्द कहते हैं, तो हम स्वाभाविक रूप से मन में पारलौकिक आनंद का अनुभव करते हैं।"
 
The mere sound of the word 'Mukti' creates a feeling of disgust and fear in the mind, but when we say the word 'Bhakti', we naturally feel divine joy in our mind."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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