श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 270
 
 
श्लोक  2.6.270 
सालोक्य - सार्ष्टि - सामीप्य - सारूप्यैकत्वमप्युत ।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥270॥
 
 
अनुवाद
सार्वभौम भट्टाचार्य ने निष्कर्ष निकाला, "'भले ही उसे सभी प्रकार की मुक्ति प्रदान की जाए, फिर भी शुद्ध भक्त उन्हें स्वीकार नहीं करता। वह भगवान की सेवा में संलग्न होकर पूर्णतः संतुष्ट रहता है।'"
 
Sarvabhauma Bhattacharya concluded, “Even if all kinds of liberations are offered, the pure devotee does not accept them. He remains content with remaining engaged in the service of the Lord.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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