श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 267
 
 
श्लोक  2.6.267 
‘सालोक्यादि’ चारि यदि हय सेवा - द्वार ।
तबु कदाचित्भक्त करे अङ्गीकार ॥267॥
 
 
अनुवाद
“यदि भगवान की सेवा करने का अवसर मिले, तो शुद्ध भक्त कभी-कभी सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य या साृष्टि मोक्ष स्वीकार कर लेता है, किन्तु सायुज्य मोक्ष कभी स्वीकार नहीं करता।
 
“If a pure devotee gets an opportunity to serve the Supreme Personality of Godhead, he sometimes accepts Salokya, Sarupya, Samipya or Sarshti Mukti, but never Sayujya.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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