सिद्धलोकस्तु तमसः पारे यत्र वसन्ति हि
सिद्धा ब्रह्मसुखे मग्ना दैत्याश्च हरिणा हताः
"सिद्धलोक [ब्रह्मलोक] में दो प्रकार के जीव रहते हैं - वे जिन्हें भगवान के द्वारा मारा जाता है क्योंकि वे अपने पिछले जन्मों में दैत्य थे और वे जो भगवान के निराकार तेज का आनंद लेने के बहुत शौकीन हैं।" तमसः शब्द का अर्थ है "ब्रह्मांड का आवरण।" भौतिक तत्वों की परतें ब्रह्मांड को ढँकती हैं, और इन आवरणों के बाहर निराकार ब्रह्म का तेज है। अगर किसी को भगवान के निराकार तेज में रहना है, तो वह भगवान को सेवा करने का अवसर छोड़ देता है। इसलिए भक्त, निराकार ब्रह्म के तेज में रहने को एक प्रकार की सजा मानते हैं। कभी-कभी भक्त ब्रह्म तेज में विलय करने के बारे में सोचते हैं, और परिणामस्वरूप उन्हें सिद्धलोक में पदोन्नत किया जाता है। उनकी निराकार समझ के कारण, उन्हें वास्तव में दंडित किया जाता है। सर्वभौम भट्टाचार्य निम्नलिखित छंदों में मुक्ति-पद और भक्ति-पद के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हैं।
