श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 262
 
 
श्लोक  2.6.262 
प्रभु कहे, ‘मुक्ति - पदे’ - इहा पाठ हय ।
‘भक्ति - पदे’ केने पड़, कि तोमार आशय ॥262॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरंत कहा, "उस श्लोक में शब्द 'मुक्ति-पदे' है, लेकिन आपने इसे 'भक्ति-पदे' में बदल दिया है। आपका इरादा क्या है?"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu immediately objected, “That verse contains the word ‘muktipade’, but you have changed it to ‘bhaktipade’. What do you mean?”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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