तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्म - कृतं विपाकम् ।
द्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो भक्ति - पदे स दाय - भाक् ॥261॥
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अनुवाद
भट्टाचार्य ने कहा, "जो आपकी दया का आकांक्षी है और इस प्रकार अपने पूर्व कर्मों के कारण सभी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करता है, जो मन, वचन और शरीर से सदैव आपकी भक्ति में लगा रहता है, और जो सदैव आपको नमस्कार करता है, वह निश्चित रूप से आपका अनन्य भक्त बनने के लिए एक प्रामाणिक उम्मीदवार है।"
[This verse was] “He who seeks Your mercy and endures all kinds of adverse circumstances arising from his past actions, who is always engaged in Your service with mind, words and body, and who always bows down to You, is certainly worthy of becoming Your exclusive devotee.”
तात्पर्य
जब सर्वभौम भट्टाचार्य ने श्रीमद्-भागवतम (10.14.8) से इस श्लोक का पाठ किया, तो उन्होंने मूल पाठ को मुक्ति-पदे से बदलकर भक्ति-पदे कर दिया। मुक्ति का अर्थ है मुक्ति और निराकार ब्रह्म तेज में विलय होना। भक्ति का अर्थ है परमेश्वर को आध्यात्मिक सेवा प्रदान करना। शुद्ध भक्ति सेवा विकसित करने के कारण, भट्टाचार्य मुक्ति-पदे शब्द को पसंद नहीं करते थे, जो भगवान के निराकार ब्रह्म स्वरूप को दर्शाता है। हालाँकि, उन्हें श्रीमद्-भागवतम में एक शब्द को बदलने का अधिकार नहीं था, जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु बताएँगे। यद्यपि भट्टाचार्य ने अपने भक्तिपूर्ण आनंद में शब्द बदल दिया, श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसे स्वीकार नहीं किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥