श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 258
 
 
श्लोक  2.6.258 
‘श्री - कृष्ण - चैतन्य शची - सूत गुण - धाम’ ।
एइ ध्यान, एइ जप, लय एइ नाम ॥258॥
 
 
अनुवाद
भट्टाचार्य सदैव माता शची के पुत्र और समस्त गुणों के आगार श्री कृष्ण चैतन्य का पवित्र नाम जपते थे। वास्तव में, पवित्र नामों का जप ही उनका ध्यान बन गया था।
 
Bhattacharya always chanted the name of Sri Krishna Chaitanya, the son of Mother Shachi and the embodiment of all virtues. Indeed, chanting the name became his meditation.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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