श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 256
 
 
श्लोक  2.6.256 
एइ दुइ श्लोक - भक्त - कण्ठे रत्न - हार ।
सार्वभौमेर कीर्ति घोषे ढक्का - वाद्याकार ॥256॥
 
 
अनुवाद
सार्वभौम भट्टाचार्य द्वारा रचित ये दो श्लोक सदैव उनके नाम और यश की घोषणा ढोल की तरह जोर से करते रहेंगे, क्योंकि ये सभी भक्तों के गले में मोतियों की माला बन गए हैं।
 
These two verses composed by Sarvabhauma Bhattacharya will always proclaim his name and fame loudly like the beat of a drum, because these verses have become the jewels around the necks of all the devotees.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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