श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 230
 
 
श्लोक  2.6.230 
“आजि मुञि अनायासे जिनिनु त्रिभुवन ।
आजि मुञि करिनु वैकुण्ठ आरोहण” ॥230॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "आज मैंने तीनों लोकों पर बड़ी सरलता से विजय प्राप्त कर ली है। आज मैं परमधाम पहुँच गया हूँ।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "Today I have conquered the three worlds with great ease. Today I have attained Vaikuntha."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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