श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 226
 
 
श्लोक  2.6.226 
न देश - नियमस्तत्र न काल - नियमस्तथा ।
प्राप्तमन्नं द्रुतं शिष्टैर्भोक्तव्यं हरिरब्रवीत् ॥226॥
 
 
अनुवाद
"भगवान कृष्ण का प्रसाद सज्जनों को प्राप्त होते ही ग्रहण कर लेना चाहिए; इसमें कोई संकोच नहीं होना चाहिए। समय और स्थान संबंधी कोई नियम नहीं हैं। यह भगवान का आदेश है।"
 
"The gentleman should accept Lord Krishna's prasada as soon as it is received; there should be no hesitation in this. There are no rules regarding time or place. This is the order of the Supreme Personality of Godhead."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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