श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 225
 
 
श्लोक  2.6.225 
शुष्कं पर्युषितं वापि नीतं वा दूर - देशतः ।
प्राप्ति - मात्रेण भोक्तव्यं नात्र काल - विचारणा ॥225॥
 
 
अनुवाद
भट्टाचार्य ने कहा, "भगवान का महाप्रसाद प्राप्त होते ही उसे तुरंत खा लेना चाहिए, चाहे वह सूखा हुआ, बासी या दूर देश से लाया हुआ ही क्यों न हो। न तो समय का विचार करना चाहिए और न ही स्थान का।"
 
Bhattacharya said, "Once you receive the Lord's Mahaprasad, you should immediately consume it, even if it is dry, stale, or brought from a distant land. Time and place should not be considered."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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