श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 208
 
 
श्लोक  2.6.208 
अश्रु, स्तम्भ, पुलक, स्वेद, कम्प थरहरि ।
नाचे, गाय, कान्दे, पड़े प्रभु - पद ध रि’ ॥208॥
 
 
अनुवाद
भगवान के प्रेम में विह्वल होकर भट्टाचार्य की आँखों से आँसू बहने लगे और उनका शरीर स्तब्ध हो गया। वे भावविभोर हो गए, पसीना-पसीना हो गए, काँपने लगे और थरथराने लगे। वे कभी नाचते, कभी कीर्तन करते, कभी रोते और कभी भगवान के चरणकमलों को छूने के लिए गिर पड़ते।
 
Bhattacharya's eyes welled with tears, and his body was stunned by the ecstasy of love for the Lord. He was thrilled and perspired, trembling and shaking. He would sometimes dance, sometimes sing, sometimes weep, and sometimes fall down to touch the Lord's lotus feet.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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