श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 205
 
 
श्लोक  2.6.205 
प्रभुर कृपाय ताँर स्फुरिल सब तत्त्व ।
नाम - प्रेम - दान - आदि वर्णेन महत्त्व ॥205॥
 
 
अनुवाद
भगवान की कृपा से सार्वभौम भट्टाचार्य को सभी सत्यों का ज्ञान हो गया और वे पवित्र नाम के कीर्तन तथा सर्वत्र भगवत्प्रेम के वितरण के महत्व को समझ सके।
 
By the grace of Mahaprabhu, all the elements of Sarvabhaum Bhattacharya got energized and he could understand the importance of chanting the name of God and spreading the love of God everywhere.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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