सनकादि - शुकदेव ताहाते प्रमाण ।
एइ - मत नाना अर्थ करेन व्याख्यान ॥198॥
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अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने शुकदेव गोस्वामी और चार ऋषियों - सनक, सनत्कुमार, सनातन और सनन्दन - के संदर्भ में प्रमाण देकर इस श्लोक का अर्थ समझाया। इस प्रकार भगवान ने विभिन्न अर्थ और व्याख्याएँ दीं।
Sri Chaitanya Mahaprabhu explained this verse by presenting the evidence of Shukadev Goswami and four sages named Sanak, Sanatkumar, Sanatan and Sanandan. In this way Mahaprabhu presented various meanings and interpretations.
तात्पर्य
कृष्ण सर्व-आकर्षक हैं ये बात चार ऋषियों और शुकदेव गोस्वामी के कार्यों से सिद्ध होती है। वे सभी मुक्त व्यक्ति थे, पर उन्हें प्रभु के गुण और लीलाएँ आकर्षित करती थीं। इसलिए कहा गया है, मुक्ता अपि लीलाया विग्रहम कृत्वा भगवंतम् भजन्ते: “यहाँ तक कि मुक्त व्यक्ति भी भगवान कृष्ण की लीलाओं से आकर्षित होते हैं और इस तरह भक्ति सेवा में लग जाते हैं।” (चैतन्य चरितामृत, मध्य 24.112) अपने जीवन के आरंभ से ही, शुकदेव गोस्वामी और चार कुमार, जिन्हें चतुः-सन कहा जाता है, ब्रह्म-तत्व में मुक्त और आत्म-साक्षात होते थे। फिर भी, वे कृष्ण के गुणों से आकर्षित होते थे, और उन्होंने उनके सेवा में तत्पर रहे। चार कुमारों को कृष्ण के कमलों पर चढ़ाए पुष्पों की सुगंध ने आकर्षित किया, और इस तरह वे भक्त बन गए। शुकदेव गोस्वामी को श्रीमद्भागवतम् अपने पिता व्यासदेव की कृपा से सुनने को मिला, और फलस्वरूप वे कृष्ण की ओर आकर्षित हुए और एक महान भक्त बन गए। निष्कर्ष यह है कि प्रभु की सेवा में अनुभव किया गया भौतिक आनंद ब्रह्मानंद से श्रेष्ठ होना चाहिए, जो निराकार ब्रह्म को प्राप्त करने से मिलने वाला आनंद है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥