श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 195
 
 
श्लोक  2.6.195 
तत्तत्पद - प्राधान्ये ‘आत्माराम’ मिला ञा ।
अष्टादश अर्थ कैल अभिप्राय लञा ॥195॥
 
 
अनुवाद
भगवान चैतन्य महाप्रभु ने प्रत्येक शब्द को विशिष्ट रूप से लिया और उसे "आत्माराम" शब्द के साथ जोड़ दिया। इस प्रकार उन्होंने "आत्माराम" शब्द की अठारह विभिन्न विधियों से व्याख्या की।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu took each word and added the word "Atmaram" to it. Thus, he interpreted the word "Atmaram" in eighteen different ways.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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