श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 192
 
 
श्लोक  2.6.192 
किन्तु तुमि अर्थ कैले पाण्डित्य - प्रतिभाय ।
इहा वइ श्लोकेर आछे आरो अभिप्राय ॥192॥
 
 
अनुवाद
“हे प्रिय भट्टाचार्य, आपने अपने विशाल ज्ञान के बल पर इस श्लोक की व्याख्या अवश्य की है, किन्तु आपको यह जान लेना चाहिए कि इस विद्वत्तापूर्ण व्याख्या के अतिरिक्त इस श्लोक का एक और तात्पर्य भी है।”
 
“O dear Bhattacharya, you have certainly interpreted this verse with the help of your vast erudition, but you should know that apart from this scholarly interpretation, this verse has another meaning.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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