श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 183
 
 
श्लोक  2.6.183 
शुनि’ भट्टाचार्य हैल परम विस्मित ।
मुखे ना निःसरे वाणी, हइला स्तम्भित ॥183॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य बहुत आश्चर्यचकित हुए। वे स्तब्ध रह गए और कुछ नहीं बोले।
 
Hearing this, Sarvabhauma Bhattacharya was astonished. He was stunned and could not say anything.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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